Monday, November 23, 2009
किसको फंसा रहे हैं संजय राउत
Sunday, November 15, 2009
लोकतंत्र बड़ा कि स्वाइन फ्लू
लोकतंत्र का महाउत्सव है चुनाव। राजस्थान में नगर निकाय चुनाव की धूम चरम पर है। शहरों में कार्यालय खुल रहे हैं, प्रचार प्रसार के लिए नेताओं की सभाएं हो रही हैं। एक तरफ तो स्वाइन फ्लू पर नियंत्रण के लिए स्कूलों में सामूहिक कार्यक्रमों पर रोक लगा दी गई है दूसरी ओर इन नेताओं की सभाओं पर किसी प्रकार का नियंत्रण घोषित नहीं किया गया है तो फिर कैसे होगा स्वाइन फ्लू पर नियंत्रण। पर इन नेताओं पर शिकंजा कौन कसे? जिस दिन इन पर शिकंजा कसने वाला माई का लाल कोई पैदा हो गया, उस दिन स्वाइन फ्लू तो क्या, भष्टाचार और आतंकवाद जैसी तमाम बीमारियां मिट ही जाएंगी। बहरहाल, स्वाइन फ्लू जोरों पर है और चुनाव प्रचार भी। देखते जाइए, अंतिम परिणाम देखकर ही पता चलेगा कि कौनसी चीज कितनी नुकसानदेह साबित हुई। इतना जरूर तय है कि जनता को तो बीमार ही होना है। जनता बेचारी द्रौपदी जो ठहरी... इस कलयुग में कोई कृष्ण भी नहीं दिखता।
स्वाइन फ्लू बनाम जवाहर लाल नेहरू
फिर मारी बाजी
चुनाव की राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले भाजपा से निलंबित राजेंद्र राठौड़ अपने गृहजिले चूरू की नगर परिषद चुनाव में फिर बाजी मारते दिखाई दे रह हैं। एक तो उन्होंने अपने चहेते रमाकांत ओझा को कमजोर दावेदारी और घटते जनाधार के बावजूद पार्टी का टिकट दिलवा दिया और दूसरे अब विजय श्री भी ओझा को ही मिलती दिख रही है। इसमें भी राठौड़ साहब की ही करामात दिखती है। भाजपा के तो खैर निलंबित ही सही, वे नेता है लेकिन ज्यादा बड़ी करामात तो उनके द्वारा कांग्रेस की टिकट दिलवाने को माना जा रहा है। चूरू के मौजूदा विधायक पुत्र और राजेंद्र राठौड़ के आपसी संबंधों की बात हमेशा से होती रही है, मौके-बेमौके इस बात को दोनों ने स्वीकारा भी है। कांग्रेस द्वारा गोविंद महनसरिया को टिकट दिए जाने से यह साबित हो गया है कि कांग्रस विधायक पुत्र पर भी राठौड़ साहब की पकड़ उतनी ही बरकरार है। शायद यही वजह है कि कांग्रेस ने हारने के लिए अपने प्रत्याशी को खड़ा कर दिया है और चुनाव जीता देने वाले कांग्रेसी कार्यकर्ता टिकट की कतार में खड़े देखते ही रह गए। दूसरे उम्मीदवार भी मैदान में इस तरह के हैं, जिन्हें देखकर कहा जा सकता है कि अब रमाकांत ओझा की जीत में कोई शक नहीं। आगे, खुदा जाने...